MAA Love shayri and poetry
Poem about Mother in Hindi | Maa Par Kavita in Hindi | माँ पर कविता
Poem about Mother in Hindi – दोस्तों आज इस पोस्ट में माँ पर आधारित कुछ माँ पर कविता को इकट्ठा किया हैं. यह Maa Par Kavita in Hindi बहुत ही लोकप्रिय कविता हैं. जो आपके दिल को छु जाएगी.
दोस्तों माँ के प्यार को कुछ शब्दों में व्यक्त करना बहुत मुश्किल हैं. इस दुनिया में आपको माँ से ज्यादा प्यार और कोई कर ही नहीं सकता हैं. आपके जीवन के राह में आने वाली सभी बाधाओं को हटाती हैं. माँ आपके बारे में सबकुछ जानती हैं. आपके कुछ कहे बिना ही आपको क्या चाहिए माँ समझ जाती हैं.
माँ बिना थके अपने बच्चों की सभी इक्षा को पूरा करना चाहती हैं. हमें एक अच्छे इन्सान बनाने के कोशिश करती हैं. माँ हमें हमेशा खुश देखना चाहती हैं. कहा जाता हैं की माँ की पुकार सुनकर भगवान भी आ जाते हैं.
माँ पर कविता लिखना आसान काम नहीं हैं. यहाँ पर Poem about Mother in Hindi में कुछ लोकप्रिय कविता निचे दी गई हैं. हमें आशा हैं की यह आपको पसंद आएगी. Poem about Mother in Hindi, Maa Par Kavita in Hindi, माँ पर कविता, Maa Kavita, Short Poem on Mother in Hindi.
माँ पर कविता, Poem about Mother in Hindi, Maa Par Kavita in Hindi
1. Poem about Mother in Hindi – चिंतन दर्शन जीवन सर्जन
चिंतन दर्शन जीवन सर्जन
रूह नज़र पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर शराबा
अंधियारी रातों में मुझको
थपकी देकर कभी सुलाती
कभी प्यार से मुझे चूमती
कभी डाँटकर पास बुलाती
कभी आँख के आँसू मेरे
आँचल से पोंछा करती वो
सपनों के झूलों में अक्सर
धीरे-धीरे मुझे झुलाती
सब दुनिया से रूठ रपटकर
जब मैं बेमन से सो जाता
हौले से वो चादर खींचे
अपने सीने मुझे लगाती तनहाई अम्मा
उसने खुद़ को खोकर मुझमें
एक नया आकार लिया है,
धरती अंबर आग हवा जल
जैसी ही सच्चाई अम्मा
सारे रिश्ते- जेठ दुपहरी
गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समंदर
भीनी-सी पुरवाई अम्मा
घर में झीने रिश्ते मैंने
लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके चुपके कर देती थी
जाने कब तुरपाई अम्मा
बाबू जी गुज़रे, आपस में-
सब चीज़ें तक़सीम हुई तब-
मैं घर में सबसे छोटा था
मेरे हिस्से आई अम्मा
2. Maa Par Kavita in Hindi
चूल्हे की
जलती रोटी सी
तेज आँच में जलती माँ !
भीतर -भीतर
बलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती माँ !
धागे -धागे
यादें बुनती ,
खुद को
नई रुई सा धुनती ,
दिन भर
तनी ताँत सी बजती
घर -आँगन में चलती माँ !
सिर पर
रखे हुए पूरा घर
अपनी –
भूख -प्यास से ऊपर ,
घर को
नया जन्म देने में
धीरे -धीरे गलती माँ !
फटी -पुरानी
मैली धोती ,
साँस -साँस में
खुशबू बोती ,
धूप -छाँह में
बनी एक सी
चेहरा नहीं बदलती माँ !
3. माँ पर कविता
अंधियारी रातों में मुझको
थपकी देकर कभी सुलाती
कभी प्यार से मुझे चूमती
कभी डाँटकर पास बुलाती
कभी आँख के आँसू मेरे
आँचल से पोंछा करती वो
सपनों के झूलों में अक्सर
धीरे-धीरे मुझे झुलाती
सब दुनिया से रूठ रपटकर
जब मैं बेमन से सो जाता
हौले से वो चादर खींचे
अपने सीने मुझे लगाती

Comments